स्वामी विवेकानंद जी की जीवनी । swami vivekananda jivan parichay

युवा प्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानंद जी के जीवन का परिचय इस लेख के माध्यम से प्राप्त कर सकेंगे। यह लेख स्वामी जी के संपूर्ण जीवन पर प्रकाश डालने में सक्षम हैं। उनके जन्म , शिक्षा , यात्रा , धर्म-संस्कृति आदि के विषय में जानकारी देता है।

जागरण के पुरोधा व्यक्ति के रूप में शुमार स्वामी विवेकानंद ने समाज के लिए अपना व्यक्तिगत जीवन त्याग दिया था।

स्वामी विवेकानंद किसी परिचय के मोहताज नहीं है। उनकी प्रसिद्धि देश-विदेश में है।

उन्हें आज भी संकल्प शक्ति , आत्मविश्वास , प्रेरणा स्रोत आदि के क्षेत्र में महात्मा माना जाता है। इस लेख के माध्यम से उनके जीवन को जानने का छोटा सा प्रयास किया है।

आशा है इस लेख के माध्यम से आप स्वामी जी के विषय में अध्ययन कर सकेंगे –

स्वामी विवेकानंद – Swami vivekananda jivani

स्वामी विवेकानंद का जन्म कोलकाता के मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ। उनका आरंभिक जीवन साधारण बालकों की भांति था। परिवार से उन्हें काफी कुछ सीखने को मिला। दादा दुर्गाचरण दास धार्मिक थे , संस्कृत , फारसी पर अच्छी पकड़ थी। माता धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थी। जिसके कारण घर में पूजा-पाठ , कथा-वाचन आदि का कार्यक्रम प्रतिदिन चलता था।  पिता कोलकाता हाई कोर्ट में प्रसिद्ध वकील थे। बालक नरेंद्र ने शिक्षा के रूप में मजबूत नींव घर से प्राप्त की थी।

जन्म  12 जनवरी 1863 ( मकर संक्रांति के दिन)
स्थान  कोलकाता (वर्तमान पश्चिम बंगाल)
नाम  नरेंद्र नाथ दत्त (स्वामी विवेकानंद)
पिता का नाम  विश्वनाथ दत्त (कोलकाता विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध वकील)
माता का नाम भुवनेश्वरी दत्त
धर्म  सनातन हिंदू
शिक्षा  स्नातक , वेद-पुराण की जानकारी , ललित कला से प्रभात आदि
शिक्षक का नाम  रामकृष्ण परमहंस
कार्य  धर्म-संस्कृति का प्रचार-प्रसार , मठ , आश्रम की स्थापना।
रुचि का क्षेत्र  अध्यात्म के प्रति लगाओ , शारीरिक व्यायाम , योग , प्रसिद्ध विचारकों सिद्धांत को का अध्ययन।
मृत्यु 

4 जुलाई 1902 बेलूर मठ पश्चिम बंगाल में महासमाधि मे लीन हुए।

 

स्वामी विवेकानंद जी का बचपन

कोलकाता के बंगाली कायस्थ परिवार में मकर संक्रांति के दिन एक दिव्य बालक का जन्म हुआ। मकर संक्रांति का महत्व हिंदू संस्कृति में विशेष है। विश्व के वैज्ञानिक भी इस दिन के विशेष महत्व को मानते हैं। बालक का नाम वीरेश्वर रखा गया। बालक आरंभ से ही विशेष गुणों के साथ जन्मा था। घर के वातावरण ने वीरेश्वर को सोच विचार और समझ को विकसित करने में मदद की। दादा दुर्गा चरण दत्त धर्म-संस्कृति के जानकार थे। संस्कृत और फारसी भाषा मे उनका मजबूत हाथ था।

घर में प्रतिदिन कथा-वाचन , पूजा-पाठ , महाभारत , रामायण , श्रीमद्भागवत गीता वेदों आदि का पाठ होता था। कथावाचन के लिए वाचक घर आया करते थे। माता धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थी , उन्होंने घर का वातावरण सुखद और दिव्य बनाया हुआ था। घर में सुख-शांति , समृद्धि की वर्षा होती थी। वीरेश्वर का मन इस वातावरण में रम गया। घर आए हुए कथावाचक तथा परिवार में ऐसे जिज्ञासु प्रश्न वीरेश्वर द्वारा पूछे जाते , जिसका उत्तर किसी के पास नहीं होता।

पिता कोलकाता उच्च न्यायालय में प्रखर अधिवक्ता थे। उनके चातुर्य और बुद्धि कौशल का प्रचार दूर दूर तक था। वीरेश्वर में इसी प्रकार की बुद्धि थी।

दादा दुर्गाचरण दत्त पच्चीस वर्ष की आयु मे अपना घर-परिवार छोड़कर सन्यास धारण कर चुके थे। दादा तथा घर-परिवार के वातावरण से उन्होंने गीता , रामायण , वेद-पुराण , धर्म-संस्कृति आदि का गहनता से अध्ययन कर लिया था।

 

स्वामी विवेकानंद जी की आरंभिक शिक्षा

वीरेश्वर की आयु होने के साथ विद्यालयी  शिक्षा के लिए विचार किया गया। वर्ष 1871 को जब वीरेश्वर 8 वर्ष के हुए उन्हें ईश्वर चंद्र विद्यासागर मेट्रोपॉलिटन संस्थान कोलकाता में दाखिला करवाया गया। वीरेश्वर का नाम औपचारिक तौर पर नरेंद्र नाथ दत्त रखा गया। इस नाम के साथ विद्यालय में शिक्षा आरंभ हुई। विद्यालय शिक्षा से पूर्व उन्होंने घर से आरंभिक शिक्षा प्राप्त कर ली थी।

विद्यालय शिक्षा में उनका मन अधिक नहीं लगता था। वह विद्यालय शिक्षा को बोझिल मानते थे। नरेंद्र वर्ष भर में पढ़ने वाली सामग्री को कुछ ही दिनों में पढ जाया करते थे। उनके पास नया करने को वर्ष भर में कुछ नहीं रहता था। जिसके कारण वह अधिक परेशान रहते थे। शिक्षक उनसे अधिक प्रसन्न रहते थे। उनकी प्रतिभा का सम्मान करते थे। वार्षिक प्रणाली के अंतर्गत शिक्षा दी जाती थी , जिसके कारण शिक्षक कुछ नहीं कर पाते।

नरेंद्र नाथ ने बचपन में ही श्रीमद्भागवत , गीता , रामायण , वेद-पुराण आदि की शिक्षा प्राप्त कर ली थी वह विद्यालय शिक्षा के अतिरिक्त जीवन की वास्तविकता को समझने का प्रयत्न करते।

  • जीव , सुख-दुख क्या होता है ?
  • ईश्वर की प्राप्ति कैसे हो सकती है ?
  • माया क्या होती है ?
  • सुखी व्यक्ति कौन है ?
  • दुख के क्या कारण है ? यह सभी बालक मन में जानने की जिज्ञासा सदैव जागृत रहती। इसी खोज में वह दिन-रात रहते।

उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने 1879  प्रेसीडेंसी कॉलेज प्रवेश परीक्षा में सर्वाधिक अंक प्राप्त किया। इससे पूर्व किसी भारतीय ने इस प्रवेश परीक्षा में अपार सफलता प्राप्त नहीं की थी।

 

स्वामी विवेकानंद की विभिन्न क्षेत्रों में रुचि

स्वामी जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे उस जैसा बालक कोई सदियों में एक होता है। विवेकानंद धर्म संस्कृति के क्षेत्र में गहन रुचि लेते थे यही कारण है उन्होंने देश ही नहीं अपितु विदेश के समस्त धर्मों का अध्ययन किया था। वह शारीरिक रूप से बहुत मजबूत थे उनका मानना था जो व्यक्ति शरीर से कमजोर होता है वह मन से कभी मजबूत नहीं हो सकता। वह योग , शारीरिक व्यायाम , खेल संगीत आदि के विषय में गहन रूचि रखते थे।

योग प्रतिदिन दिनचर्या में शामिल होता था सारी के लिए भी वह विशेष यत्न करते थे। संगीत के क्षेत्र में उन्होंने कॉलेज की परीक्षा पास की थी वह शास्त्रीय संगीत को अपना जीवन मानते थे संगीत के बिना मानव जीवन अधूरा है ऐसा विचार था।

स्वामी जी ने इस समय तक श्रीमद्भागवत गीता , रामायण , महाभारत , वेद , पुराण , मनुस्मृति , धर्म -संहिता ,उपनिषद आदि अनेक साहित्य का गहन अध्ययन किया था।

रामकृष्ण परमहंस से मुलाकात

रामकृष्ण परमहंस बालक नरेंद्र के आध्यात्मिक गुरु थे। स्वामी जी की मुलाकात 1881 में हुई। वह अपने गुरु के शरण में लगभग 6 वर्ष तक रहे। विद्यालय /विश्वविद्यालय शिक्षा के उपरांत वह रामकृष्ण परमहंस के संपर्क में आए। परमहंस को धर्म गुरु के रूप में उन्होंने चयन किया। बालक नरेंद्र के प्रतिभा और उसके कुशाग्र बुद्धि को देखते हुए गुरु रामकृष्ण परमहंस ने नरेंद्र को विवेकानंद कहना आरंभ किया। यही विवेकानंद विश्व भर में स्वामी विवेकानंद के नाम से प्रसिद्ध हुए।

16 अगस्त 1886 को रामकृष्ण परमहंस परमात्मा में लीन हो गए थे।

शिक्षा के क्षेत्र में कार्य

विवेकानंद जी समाज में बदलाव चाहते थे , यह बदलाव स्वयं व्यक्ति से चाहते थे। उनका मानना था बदलाव की शुरुआत अपने भीतर से करनी चाहिए। बदलाव के लिए व्यक्ति को ज्ञान की आवश्यकता होती है। सही गलत में फर्क शिक्षा के द्वारा ही संभव है। इसलिए उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में सराहनीय कार्य किया।

शिक्षा के लिए स्वामी विवेकानंद के विचार थे –

” भारत के सत्यानाश का मुख्य कारण यही है , कि देश की संपूर्ण विद्या-बुद्धि , राज्य शासन और दंभ केबल से मुट्ठी भर लोगों के एकाधिकार में रखी गई है। “

शिक्षा से सामान्य जनमानस वंचित था , जिसके कारण वह निरंतर शोषण का शिकार हो रहे थे। उनकी अज्ञानता उनके पराधीनता का मूल कारण थी। वह स्त्री शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। बदलाव के लिए वह आम लोगों में शिक्षा के प्रसार पर बल देते थे।

उन्होंने अनेक ऐसे गुरुकुल का निर्माण किया जहां सभी लोग शिक्षा ग्रहण कर सकते थे।

स्वामी जी ने अंग्रेजी साहित्य का बांग्ला भाषा में अनुवाद किया।

लोगों को पश्चिमी साहित्यों से परिचय करवाया। हिंदी साहित्य में – उपन्यास , कहानी , नाटक आदि बांग्ला साहित्य के माध्यम से ही आया है।

 

स्वामी विवेकानंद जी का धार्मिक क्षेत्र में कार्य

भारतीय समाज अनेक जाति , वर्ग , समूह में बनती हुई थी। छोटे जाति तथा समुदाय के लोगों को धर्म का भय दिखाकर उनका शोषण किया जाता था। उन्हें यकीन दिलाया जाता था , कि उनका शोषण पूर्व जन्म का फल है। नीची जाति के लोग अपना कर्म फल मानकर उसे चुपचाप सहन करते थे।

धर्म के ठेकेदारों ने इसे अपना व्यापार बना लिया था।

स्वामी विवेकानंद ने समाज के बीच समानतावादी विचार का प्रसार किया। वह अद्वैतवाद को मानते थे , जो मूर्ति पूजा पर अधिक विश्वास नहीं करते थे। स्वामी जी ने मूर्ति पूजा का अत्यधिक विरोध नहीं किया। उनका मानना था अगर कोई मूर्ति पूजा करके सिद्धि के लिए कार्य करें तो यह उचित है। मूर्ति पूजा के अधिक समर्थक नहीं थे। ईश्वर की प्राप्ति के लिए मूर्ति पूजा आवश्यक नहीं है।

मन कर्म वचन से शुद्ध होना चाहिए।

वह ईश्वर को सत्य मानते थे , जगत को मिथ्या। ईश्वर की प्राप्ति के लिए ज्ञान की आवश्यकता होती है।

माया ईश्वर की प्राप्ति में बाधा है , लोगों को स्वामी जी ने बताया धर्म के माध्यम से ईश्वर की प्राप्ति संभव है। अपने मन , क्रम , वचन आदि से अपने व्यक्तिगत धर्म को बनाए रखो और अपने ईश्वर पर विश्वास करते हुए कर्म करो।  सब कुछ उन्हीं को समर्पित कर दो , दीन-दुखियों की सेवा कर नारायण की प्राप्ति संभव है।

स्वामी जी ने नर सेवा का मंत्र दिया था।

उन्होंने दिन-दुखी और दरिद्र , भूखे-प्यासे लोगों की सेवा करने के लिए रामकृष्ण परमहंस मठ(1897)  की स्थापना की थी। उनका मानना था दरिद्र नारायण की सेवा करने से साक्षात् नारायण की सेवा होती है।स्वामी जी दिखावे पर विशेष बल नहीं देते। उन्होंने बताया दिखावा उनके कार्य में बाधक होता है।

कार्य को सफलतापूर्वक करने के लिए दिखावा की आवश्यकता नहीं है।

ऐसा मानते हुए कार्य करना चाहिए।

जन समाज में व्याप्त हीन भावना को दूर करने के लिए उन्होंने अपने धर्म-संस्कृति की महानता को साहित्य के माध्यम से उपलब्ध कराया। जिसके माध्यम से भारतीय जनता अपने धर्म – संस्कृति के विषय में अध्ययन कर सकें।

इसके लिए उन्होंने वेदों की ओर लौटो का नारा भी दिया।

वह जीवन भर धर्म की महानता , विश्व बंधुत्व , भाईचारे , मानव कल्याण के लिए संघर्षरत रहे।

 

मानव कल्याण की भावना / सामाजिक क्षेत्र में कार्य

स्वामी विवेकानंद रचनात्मक समाज सुधारक थे। उस समय के समाज में विध्वंसक समाज सुधारकों की भरमार थी। धर्म परिवर्तन कराना अपने धर्म को श्रेष्ठ बताना , यह सभी अन्य धर्मों द्वारा जारी था। मुस्लिम प्रचारक  , ईसाई मिशनरी आदि भारतीय समाज में दीमक के समान थे जो भारतीय संस्कृति को भीतर से नष्ट कर रहे थे।

स्वामी विवेकानंद ने मानव कल्याण का मंत्र समाज के बीच रखा।

वह जब समाज और मानव कल्याण की बात करते हैं , तो वह विश्व बंधुत्व की वकालत करते हैं। उन्होंने मानव कल्याण , विश्व बंधुत्व और भाईचारे का संदेश सदैव दिया। स्वामी जी ने स्त्री शिक्षा के लिए अथक प्रयास किया। समाज में स्त्रियों की दयनीय स्थिति थी वह पराया धन समझी जाती थी।

स्त्रियों का शोषण समाज में निरंतर होता था।

स्वामी जी का मानना था स्त्री के शिक्षित होने से एक समाज शिक्षित होता है।

इसलिए वह स्त्री को सम्मान अधिकार और जीवन के पक्षधर थे।

समाज कल्याण की भावना से ही उन्होंने मठ तथा आश्रम की स्थापना की थी।

वर्तमान समय में बेलूर मठ की स्थापना दरिद्र नारायण की सेवा के उद्देश्यों से ही की थी।

समाज के बीच व्याप्त अंधविश्वास , कुरीति और बाह्यआडंबरों का उन्होंने पुरजोर विरोध किया। उन्होंने उन धर्म के ठेकेदारों की आलोचना की जो भारतीय जनता को भय दिखाकर उनका शोषण कर रहे थे।

 

स्वामी विवेकानंद जी की अतुलनीय स्मरण शक्ति

स्वामी विवेकानंद की स्मरण शक्ति अतुलनीय थी। वह विद्यालय के पुस्तकों को एक बार पढ़ कर याद कर लिया करते थे। वह पढ़ने – लिखने और याद करने क्षेत्र में अन्य विद्यार्थियों से अव्वल थे।

पारिवारिक संस्कार और शिक्षा ने उनकी स्मरण शक्ति को और बढ़ा दिया था।

एक समय की बात है जब वह फ़्रांस के दौरे पर थे। ‘

उन्होंने एक महान विचारक के घर आतिथ्य स्वीकारा किया था।

उस व्यक्ति के घर टेबल पर एक हजारों पृष्ठों की एक पुस्तक रखी थी। उस पुस्तक को देखकर स्वामी जी ने पुस्तक के विषय में जानने की इच्छा रखी।  वह व्यक्ति स्वामी जी पर हंसने लगा। उसने बताया यह पुस्तक दूसरे भाषा में है , जिसे आप नहीं जानते।  यह इतनी मोटी है जिसका अध्ययन मैं एक महीने से कर रहा हूं और अभी तक कुछ पृष्ठ ही पढ़ पाता हूं।

स्वामी जी ने उस पुस्तक को एक घंटे के लिए अध्ययन हेतु मांगा।

वह व्यक्ति आश्चर्यचकित रहा , किंतु हंसते हुए उसने वह किताब एक घंटे के लिए स्वामी जी को सौंप दी।

स्वामी जी उस पुस्तक को हाथ में रखकर आंखें बंद किए बैठे रहे।

एक घंटे के उपरांत जब वह व्यक्ति आया , उन्होंने आंख खोला और वह किताब वापस लौटा दिया। स्वामी जी उस किताब का पूरा अध्ययन कर चुके थे। व्यक्ति के आश्चर्य की सीमा न थी। वह इसे मजाक समझ स्वामी जी से पुस्तक के विषय में जानना चाहा ।

स्वामी जी ने पृष्ठ सहित पुस्तक की व्याख्या प्रस्तुत की।

वह व्यक्ति स्वामी जी का भक्त हो गया।

उनके स्मरण शक्ति इस प्रकार की थी कि वह जीवन में किसी अध्ययन को नहीं भूलते थे।

समाज में अनेकों लोगों से मिलते किंतु वर्षो-वर्ष बाद भी मिलने पर उनका नाम परिवार सहित याद रखते थे।

स्वामी जी ने जितने भी पुस्तकों का अध्ययन किया , वह अक्षरसः  उनको स्मरण रहता।

अपनी स्मरण शक्ति के लिए वह योग क्रिया को श्रेय देते हैं।

योगाभ्यास उनके नित्य जीवन में शामिल था।

 

स्वामी विवेकानंद जी की अंग्रेजी भाषा के प्रति उनकी राय

स्वामी विवेकानंद आरंभ से ही धर्म संस्कृति की शिक्षा ले रहे थे। विद्यालय स्तर पर जब उन्हें अंग्रेजी भाषा सीखने के लिए कहा गया। तब उन्होंने इस भाषा को विदेशी भाषा माना। यह भाषा उन लोगों की थी जिन्होंने उनके देशवासियों पर अत्याचार किया।

ऐसी भाषा और उनके विचारों को वह कभी अपनाना नहीं चाहते थे।

किंतु परिस्थितियां उन्हें अंग्रेजी शिक्षा पर विवश करती थी

जब उन्हे आभास हुआ अपने धर्म को संस्कृति को अंग्रेजों की संस्कृति से कैसे श्रेष्ट बताया जाए।

उसके संस्कृति – धर्म में ऐसी क्या बातें लिखी है जो हमारे धर्म संस्कृति से भिन्न है।

इसके अध्ययन के लिए स्वामी जी ने अंग्रेजी भाषा का अध्ययन किया।

समय के साथ-साथ स्वामी जी ने विदेश के महान दार्शनिकों , धर्म , संस्कृति आदि की समस्त पुस्तकों का गहन अध्ययन किया। महान विचारक , दार्शनिक आदि सभी के पुस्तकों से उनके व्यक्तित्व की जानकारी हासिल की।

 

स्वामी विवेकानंद जी का जन्मभूमि के प्रति लगाओ

स्वामी विवेकानंद की मातृभूमि के प्रति प्रेम देखते ही बनती थी । एक समय की बात है जब वह विदेश यात्रा से लौट कर आए।  अपनी भूमि पर पांव रखते ही उन्होंने माटी में लौटने लगे। उनसे जब पूछा गया यह क्या तो ?

उन्होंने सरलता से उत्तर दिया –

‘ मैं अपनी माता से इतने दिन दूर था , उनसे मिलकर उनके प्रेम और स्नेह को महसूस कर रहा था।

 

शिकागो धर्म सम्मेलन को संबोधन

स्वामी विवेकानंद ने 11 सितंबर 1983 को शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन में अपने वक्तव्य रखे थे। उन्होंने इस वक्तव्य के माध्यम से विश्व बंधुत्व , भाईचारे का संदेश दिया। मानव कल्याण के लिए सभी को मिलकर कार्य करने की बात कही।

भारत के महानता और उसके उदार विचारों से परिचय कराया।

गीता की वास्तविकता से धर्म सम्मेलन को परिचय करवाया।

उनके शब्द कुछ इस प्रकार है –

” अमेरिका के बहनों और भाइयों , आपके इस स्नेह पूर्ण और जोरदार स्वागत से मेरा दिल अपार हर्ष से भर गया है। मैं आपको दुनिया की सबसे प्राचीन संत परंपरा की तरफ से धन्यवाद देता हूं।

मैं आपको सभी धर्मों की जननी की तरफ से धन्यवाद देता हूं।

सभी जाति , संप्रदाय के लाखों करोड़ों हिंदुओं की तरफ से आपका आभार व्यक्त करता हूं।

मेरा धन्यवाद कुछ अन्य वक्ताओं को भी है , जिन्होंने इस मंच से यह कहा कि – दुनिया में सहनशीलता का विचार सुदूर पूर्व के देशों से फैला है। मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं , जिसने दुनिया को सहनशीलता और सार्वभौमिकता स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है। हम सिर्फ सार्वभौमिकता , सहनशीलता में ही विश्वास नहीं रखते , बल्कि में उस देश से हूं  ,जिसने इस धरती के सभी देशों और धर्मों के परेशान और सताए गए लोगों को शरण दी है।

मुझे यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि , हमने अपने हृदय में उन इजराइलीयों की पवित्र स्मृतियों को संजो कर रखा है। जिनकी धर्म स्थलों को रोमन हमलावरों ने तोड़ – तोड़कर खंडहर बना दिया था। और तब उन्होंने दक्षिण भारत में शरण ली थी। मुझे इस बात का गर्व है कि मैं , एक ऐसे धर्म से हूं जिसने महान पारसी धर्म के लोगों को शरण दी। और अभी भी उन्हें पाल पोश रहा है।

भाइयों मैं आपको एक श्लोक की कुछ पंक्तियां सुनाना चाहूंगा जिसका मैंने बचपन से स्मरण किया और दोहराता रहता हूं। और रोज करोड़ों लोगों द्वारा हर दिन दोहराया जाता है। जिस तरह अलग-अलग स्रोतों से निकली विभिन्न नदियों का अंत समुद्र में जाकर मिलती है।

उसी तरह मनुष्य अपनी इच्छा के अनुरूप अलग-अलग मार्ग चुनता है।

वह देखने में भले ही सीधे या टेढ़े-मेढ़े लगे , पर सभी भगवान तक ही जाते हैं।

वर्तमान सम्मेलन जो कि आज तक की सबसे पवित्र सभाओं में से एक है।

गीता में बताए गए इस सिद्धांत का प्रमाण है।

जो भी मुझ तक आता है , चाहे वह कैसा भी हो , मैं उस तक पहुंचता हूं।

लोग चाहे कोई भी रास्ता चुने , आखिर मे मुझतक ही पहुंचते हैं।  संप्रदायिकताए ,कट्टरताएं और इसके भयानक विध्वंसों की हठधर्मिता ने लंबे समय से पृथ्वी को अपने शिकंजे में जकड़ा हुआ है। इन्होंने पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है , कितनी बार ही यह धरती खून से लाल हुई है।

ना जाने कितनी ही सभ्यताएं तबाह हुई  है , और कितने देश मिटा दिए गए।

अगर यह भयानक राक्षस न होते तो , आज मानव समाज कहीं ज्यादा उन्नत होता।

लेकिन अब उनका समय पूरा हो चुका है।

मुझे पूरी उम्मीद है कि आज इस सम्मेलन का शंखनाद सभी हठधर्मितायों , हर तरह के क्लेश और सभी मनुष्यों के बीच की दुर्भावना ओं को विनाश करेगा चाहे वह तलवार से हो या फिर कलम से। ”

(स्वामी विवेकानन्द विश्व धर्म सम्मेलन शिकागो 11 सितंबर1893 )

 

स्वामी विवेकानंद के भाषण की 125 वीं वर्षगांठ

विवेकानन्द जी के शिकागो ऐतिहासिक भाषण के 125 वीं वर्षगांठ के उपलक्ष में विश्व हिंदू धर्म संसद का आयोजन शिकागो में किया गया। जहां मुख्य तौर पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत कथा भारतीय उपराष्ट्रपति माननीय वेंकैया नायडू जी शामिल हुए। धर्म संसद में भारत के आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी का लिखित संदेश भी पढ़ा गया।

मुख्य रूप से वेंकैया नायडू जी ने स्वामी जी के विचारों उनके आदर्श ओं का उल्लेख किया। हिंदू धर्म को किस प्रकार साजिश के तहत अछूत बनाने की कोशिश की जा रही है को उजागर किया। उन्होंने स्वामी जी की बात को उजागर करते हुए कहा – विवेकानंद विश्व बंधुत्व , भाईचारे और मानवतावाद की बात तब कहते थे। जब विश्व इन शब्द से अनभिज्ञ था। वेंकैया नायडू ने अनेक बातों को रख कर हिंदू धर्म की मान्यताओं , आस्था और उसकी महानता को विश्व पटल पर रखने का सफल प्रयास किया।

 

स्वामी विवेकानंद जी के जीवन की महत्वपूर्ण तिथियां

  • 12 जनवरी 1863 – बंगाली कायस्थ परिवार में जन्म कोलकाता
  • 1871  – ईश्वर चंद्र विद्यासागर मेट्रोपॉलिटन संस्थान कोलकाता में दाखिला।
  • 1877 – परिवार कोलकाता से रायपुर चला गया।
  • 1879 – प्रेसिडेंसी कॉलेज प्रवेश परीक्षा में सर्वोत्तम परिणाम। पहले भारतीय हैं जिन्होंने इस प्रकार के अंक प्राप्त किए।
  • 1880 – जनरल असेंबली इंस्टिट्यूट में नामांकित हुए
  • 1881 – विश्वविद्यालय स्तर की ललित कला परीक्षा में उत्तीर्ण हुए।
  • नवंबर 1881 – आध्यात्मिक गुरु रामकृष्ण परमहंस ए प्रथम मुलाकात हुई।
  • 1882 – 1886 – रामकृष्ण परमहंस के सानिध्य में रहे।
  • 16 अगस्त 1886 – रामकृष्ण परमहंस का निधन
  • 1884 –  में स्नातक की सफलतापूर्वक परीक्षा उत्तीर्ण की
  • 1884 – पिता श्री विश्वनाथ दत्त का निधन
  • 1886 – वराह नगर मठ की स्थापना
  • 1887 – वडानगर मठ की स्थापना कर औपचारिक रूप से सन्यास धारण कर लिया।
  • 1890-93 – परिव्राजक के रूप में भारत भ्रमण किया।
  • 25 दिसंबर 1892 – कन्याकुमारी में रहे
  • 13 फरवरी 1893 – उनका प्रथम व्याख्यान सिकंदराबाद में हुआ।
  • 31 मई 1893 – मुंबई से अमेरिका के लिए जलमार्ग द्वारा रवाना हुए।
  • 25 जुलाई 1893 वह कनाडा पहुंचे।
  • 30 जुलाई 1893 –  शिकागो सर पहुंचे।

 

  • अगस्त 1893 – हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जॉन राइट से मुलाकात हुई।

 

  • 11 सितंबर1893 विश्व धर्म सम्मेलन शिकागो में ऐतिहासिक भाषण दिया। यह उनका विदेशी पहला भाषण था।
  • 16 मई 1894 –  हार्वर्ड विश्वविद्यालय में व्याख्यान
  • नवंबर 1894 –  न्यूयॉर्क में वेदांत समिति की स्थापना
  • जनवरी 1895 न्यूयॉर्क में धार्मिक कक्षाओं का संचालन आरंभ हुआ।
  • अगस्त 1895-  वह  पेरिस गए
  • अक्टूबर 1895 वापस लंदन लौटे और व्याख्यान दिया।
  • 22-25 मार्च 1886 – वह पुनः लंदन चले गए
  • मई तथा जुलाई 1896 – हार्वर्ड विश्वविद्यालय में व्याख्यान
  • 28 मई 1896  – ऑक्सफोर्ड के मैक्स मूलर से भेंट हुई।
  • 30 सितंबर 1896 – नेपाल से भारत की ओर रवाना हुए
  • 15 जनवरी 1897 – कोलंबो श्री लंका पहुंचे
  • जनवरी 1897 – रामेश्वरम में उनका जोरदार स्वागत हुआ साथ ही अपना वक्तव्य भी लोगों के सामने दिया।
  • 6-15 1897 – मद्रास के शहरों में भ्रमण किया
  • 19 फरवरी 1897 –  वह वापस कोलकाता आ गए
  • 1897 – कोलकाता में रामकृष्ण परमहंस मठ की स्थापना की।
  • मई दिसंबर 1897 – उत्तर भारत की यात्रा की।
  • जनवरी 1898 – कोलकाता वापस आ गए
  • 19 मार्च 1899 अद्वैत आश्रम की स्थापना की।
  • 20 जून 1899 – पश्चिमी देशों के लिए दूसरी यात्रा आरंभ की
  • 31 जुलाई 1899  – न्यूयॉर्क पहुंचे
  • 22 फरवरी 1900 – सैन फ्रांसिस्को में वेदांत की स्थापना की
  • जून 1900 – न्यूयॉर्क में अंतिम कक्षा का आयोजन हुआ
  • 26 जुलाई 1900- यूरोप के लिए रवाना हुए।
  • 24 अक्टूबर 1900 – वियना , हंगरी , ग्रीस आदि देशों की यात्रा की
  • 26 नवंबर 1900 भारत को रवाना हुए
  • 6 दिसंबर 1900 –  बेलूर मठ में आगमन हुआ
  • 10 जनवरी 1901 – अद्वैत  आश्रम में भ्रमण किया
  • मार्च – मई 1901  – पूर्वी बंगाल और असम की तीर्थ यात्रा की
  • जनवरी-फरवरी 1902 – बोधगया और वाराणसी की यात्रा की
  • मार्च 1902 – बेलूर मठ वापस हुए
  • 4 जुलाई 1902 – स्वामी विवेकानंद महासमाधि में लीन हो गए।

(उपरोक्त समस्त यात्राएं , उनकी धार्मिक यात्रा थी।  जो भाईचारे , विश्व बंधुत्व , मानव कल्याण आदि के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए थी।  )

निष्कर्ष

स्वामी विवेकानंद जी के जीवन परिचय पर प्रकाश डालते हुए , यह स्पष्ट होता है कि उन्होंने परिवार से जिस प्रकार की शिक्षा प्राप्त की थी वह उनके व्यक्तित्व और चरित्र के निर्माण की नींव थी।  उन्होंने अपने जीवन में सदैव समाज कल्याण और मानवता की सेवा से नारायण सेवा का उद्देश्य धारण किया था।

अपने गुरु से प्राप्त शिक्षा को उन्होंने स्वयं अपने तक नहीं रखा।

इस शिक्षा को व जन – जन में बांटना चाहते थे।

शिकागो में उनके ऐतिहासिक संवाद ने विश्व को भाईचारे का संदेश दिया।

उन्हें विश्व बंधुत्व की भावना से अवगत कराया और हिंदू धर्म की श्रेष्ठता सिद्ध की।

भारत ने सदैव सभी को खुले बाहों से स्वागत किया। शिकागो सम्मेलन में यह भी बताया किस प्रकार दूसरे देशों से प्रताड़ित होकर भारत में व्यक्ति शरण पाता है।

उनकी सदैव इच्छा थी उनका समाज शिक्षित हो , इसके लिए उन्होंने साहित्य के क्षेत्र में भी विशेष योगदान दिया।  उन्होंने पश्चिमी साहित्य का अनुवाद बांग्ला भाषा में कर भारत को नवीन शिक्षा की और अग्रसर किया।

धर्म के क्षेत्र में भारत की प्रगति देखना चाहते थे।

उन्होंने जनसामान्य को धर्म से परिचय कराया।

अपने विघटन के कारणों को पहचानने की शक्ति उन्हें प्रदान की। अंधविश्वास , कर्मकांड आदि का विरोध करते हुए धर्म के ठेकेदारों की नियत पर प्रश्नचिन्ह लगाया।

स्वामी विवेकानंद लगभग 39 वर्ष की आयु को पृथ्वी पर बिताया।

किंतु उन्होंने इस छोटी उम्र में जो प्रसिद्धि हासिल की वह दुर्लभ है।

समाज के लिए उन्होंने जितना प्रयत्न किया वह अन्यत्र कहीं और नहीं देखा जाता। अंततोगत्वा वह समाज के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह करते हुए महासमाधि में लीन हो गए।

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